सिनà¥à¤§à¥ घाटी की लिपि
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इतिहासकार अरà¥à¤¨à¤¾à¤²à¥à¤¡ जे टायनबी ने कहा था कि, विशà¥à¤µ के इतिहास में अगर किसी देश के इतिहास के साथ सरà¥à¤µà¤¾à¤§à¤¿à¤• छेड़ छाड़ की गयी है, तो वह à¤à¤¾à¤°à¤¤ का इतिहास ही है।
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à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ इतिहास का पà¥à¤°à¤¾à¤°à¤®à¥à¤ तथाकथित रूप से सिनà¥à¤§à¥ घाटी की सà¤à¥à¤¯à¤¤à¤¾ से होता है, इसे हड़पà¥à¤ªà¤¾ कालीन सà¤à¥à¤¯à¤¤à¤¾ या सारसà¥à¤µà¤¤ सà¤à¥à¤¯à¤¤à¤¾ à¤à¥€ कहा जाता है। बताया जाता है, कि वरà¥à¤¤à¤®à¤¾à¤¨ सिनà¥à¤§à¥ नदी के तटों पर 3500 BC (ईसा पूरà¥à¤µ) में à¤à¤• विशाल नगरीय सà¤à¥à¤¯à¤¤à¤¾ विदà¥à¤¯à¤®à¤¾à¤¨ थी। मोहनजोदारो, हड़पà¥à¤ªà¤¾, कालीबंगा, लोथल आदि इस सà¤à¥à¤¯à¤¤à¤¾ के नगर थे।
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पहले इस सà¤à¥à¤¯à¤¤à¤¾ का विसà¥à¤¤à¤¾à¤° सिंध, पंजाब, राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ और गà¥à¤œà¤°à¤¾à¤¤ आदि बताया जाता था, किनà¥à¤¤à¥ अब इसका विसà¥à¤¤à¤¾à¤° समूचा à¤à¤¾à¤°à¤¤, तमिलनाडॠसे वैशाली बिहार तक, आज का पूरा पाकिसà¥à¤¤à¤¾à¤¨ à¤à¤µà¤‚ अफगानिसà¥à¤¤à¤¾à¤¨ तथा (पारस) ईरान का हिसà¥à¤¸à¤¾ तक पाया जाता है। अब इसका समय 7000 BC से à¤à¥€ पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨ पाया गया है।
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इस पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨ सà¤à¥à¤¯à¤¤à¤¾ की सीलों, टेबलेटà¥à¤¸ और बरà¥à¤¤à¤¨à¥‹à¤‚ पर जो लिखावट पाई जाती है उसे सिनà¥à¤§à¥ घाटी की लिपि कहा जाता है। इतिहासकारों का दावा है, कि यह लिपि अà¤à¥€ तक अजà¥à¤žà¤¾à¤¤ है, और पढ़ी नहीं जा सकी। जबकि सिनà¥à¤§à¥ घाटी की लिपि से समककà¥à¤· और तथाकथित पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨ सà¤à¥€ लिपियां जैसे इजिपà¥à¤Ÿ, चीनी, फोनेशियाई, आरà¥à¤®à¥‡à¤¨à¤¿à¤•, सà¥à¤®à¥‡à¤°à¤¿à¤¯à¤¾à¤ˆ, मेसोपोटामियाई आदि सब पढ़ ली गयी हैं।
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आजकल कमà¥à¤ªà¥à¤¯à¥‚टरों की सहायता से अकà¥à¤·à¤°à¥‹à¤‚ की आवृतà¥à¤¤à¤¿ का विशà¥à¤²à¥‡à¤·à¤£ कर मारà¥à¤•ोव विधि से पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨ à¤à¤¾à¤·à¤¾ को पढना सरल हो गया है।
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सिनà¥à¤§à¥ घाटी की लिपि को जानबूठकर नहीं पढ़ा गया और न ही इसको पढने के सारà¥à¤¥à¤• पà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤¸ किये गà¤à¥¤ à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ इतिहास अनà¥à¤¸à¤¨à¥à¤§à¤¾à¤¨ परिषद (Indian Council of Historical Research) जिस पर पहले अंगà¥à¤°à¥‡à¤œà¥‹ और फिर नकारातà¥à¤®à¤•ता से गà¥à¤°à¤¸à¥à¤¤ सà¥à¤µà¤¯à¤‚ सिदà¥à¤§ इतिहासकारों का कबà¥à¤œà¤¼à¤¾ रहा, ने सिनà¥à¤§à¥ घाटी की लिपि को पढने की कोई à¤à¥€ विशेष योजना नहीं चलायी।
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कà¥à¤¯à¤¾ था सिनà¥à¤§à¥ घाटी की लिपि में? अंगà¥à¤°à¥‡à¤œ और सà¥à¤µà¤¯à¤‚ सिदà¥à¤§ इतिहासकार कà¥à¤¯à¥‹à¤‚ नहीं चाहते थे, कि सिनà¥à¤§à¥ घाटी की लिपि को पढ़ा जाà¤?
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अंगà¥à¤°à¥‡à¤œ और सà¥à¤µà¤¯à¤‚ सिदà¥à¤§ इतिहासकारों की नज़रों में सिनà¥à¤§à¥ घाटी की लिपि को पढने में निमà¥à¤¨à¤²à¤¿à¤–ित खतरे थे...
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1. सिनà¥à¤§à¥ घाटी की लिपि को पढने के बाद उसकी पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨à¤¤à¤¾ और अधिक पà¥à¤°à¤¾à¤¨à¥€ सिदà¥à¤§ हो जायेगी। इजिपà¥à¤Ÿ, चीनी, रोमन, गà¥à¤°à¥€à¤•, आरà¥à¤®à¥‡à¤¨à¤¿à¤•, सà¥à¤®à¥‡à¤°à¤¿à¤¯à¤¾à¤ˆ, मेसोपोटामियाई से à¤à¥€ पà¥à¤°à¤¾à¤¨à¥€. जिससे पता चलेगा, कि यह विशà¥à¤µ की सबसे पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨ सà¤à¥à¤¯à¤¤à¤¾ है। à¤à¤¾à¤°à¤¤ का महतà¥à¤µ बढेगा जो अंगà¥à¤°à¥‡à¤œ और उन इतिहासकारों को बरà¥à¤¦à¤¾à¤¶à¥à¤¤ नहीं होगा।
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2. सिनà¥à¤§à¥ घाटी की लिपि को पढने से अगर वह वैदिक सà¤à¥à¤¯à¤¤à¤¾ साबित हो गयी तो अंगà¥à¤°à¥‡à¤œà¥‹ और सà¥à¤µà¤¯à¤‚ सिदà¥à¤§ दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ फैलाये गठआरà¥à¤¯ दà¥à¤°à¤µà¤¿à¤¡à¤¼ यà¥à¤¦à¥à¤§ वाले पà¥à¤°à¥‹à¤ªà¤—ंडा के धà¥à¤µà¤¸à¥à¤¤ हो जाने का डर है।
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3. अंगà¥à¤°à¥‡à¤œ और सà¥à¤µà¤¯à¤‚ सिदà¥à¤§ इतिहासकारों दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ दà¥à¤·à¥à¤ªà¥à¤°à¤šà¤¾à¤°à¤¿à¤¤ ‘आरà¥à¤¯ बाहर से आई हà¥à¤ˆ आकà¥à¤°à¤®à¤£à¤•ारी जाति है और इसने यहाठके मूल निवासियों अरà¥à¤¥à¤¾à¤¤ सिनà¥à¤§à¥ घाटी के लोगों को मार डाला व à¤à¤—ा दिया और उनकी महान सà¤à¥à¤¯à¤¤à¤¾ नषà¥à¤Ÿ कर दी। वे लोग ही जंगलों में छà¥à¤ª गà¤, दकà¥à¤·à¤¿à¤£ à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ (दà¥à¤°à¤µà¤¿à¤¡à¤¼) बन गà¤, शूदà¥à¤° व आदिवासी बन गà¤â€™, आदि आदि गलत साबित हो जायेगा।
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कà¥à¤›Â इतिहासकार सिनà¥à¤§à¥ घाटी की लिपि को सà¥à¤®à¥‡à¤°à¤¿à¤¯à¤¨ à¤à¤¾à¤·à¤¾ से जोड़ कर पढने का पà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤¸ करते रहे तो कà¥à¤› इजिपà¥à¤¶à¤¿à¤¯à¤¨ à¤à¤¾à¤·à¤¾ से, कà¥à¤› चीनी à¤à¤¾à¤·à¤¾ से, कà¥à¤› इनको मà¥à¤‚डा आदिवासियों की à¤à¤¾à¤·à¤¾, और तो और, कà¥à¤› इनको ईसà¥à¤Ÿà¤° दà¥à¤µà¥€à¤ª के आदिवासियों की à¤à¤¾à¤·à¤¾ से जोड़ कर पढने का पà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤¸ करते रहे। ये सारे पà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤¸ असफल साबित हà¥à¤à¥¤
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सिनà¥à¤§à¥ घाटी की लिपि को पढने में निमà¥à¤²à¤¿à¤–ित समसà¥à¤¯à¤¾à¤ बताई जाती है...
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सà¤à¥€ लिपियों में अकà¥à¤·à¤° कम होते है, जैसे अंगà¥à¤°à¥‡à¤œà¥€ में 26, देवनागरी में 52 आदि, मगर सिनà¥à¤§à¥ घाटी की लिपि में लगà¤à¤— 400 अकà¥à¤·à¤° चिनà¥à¤¹ हैं। सिनà¥à¤§à¥ घाटी की लिपि को पढने में यह कठिनाई आती है, कि इसका काल 7000 BC से 1500 BC तक का है, जिसमे लिपि में अनेक परिवरà¥à¤¤à¤¨ हà¥à¤ साथ ही लिपि में सà¥à¤Ÿà¤¾à¤‡à¤²à¤¿à¤¶ वेरिà¤à¤¶à¤¨ बहà¥à¤¤ पाया जाता है। ये निषà¥à¤•रà¥à¤· लोथल और कालीबंगा में सिनà¥à¤§à¥ घाटी व हड़पà¥à¤ªà¤¾ कालीन अनेक पà¥à¤°à¤¾à¤¤à¤¾à¤¤à¥à¤µà¤¿à¤• साकà¥à¤·à¥à¤¯à¥‹à¤‚ का अवलोकन करने के बाद निकला।
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à¤à¤¾à¤°à¤¤ की पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨à¤¤à¤® लिपियों में से à¤à¤• लिपि है जिसे बà¥à¤°à¤¾à¤¹à¥à¤®à¥€ लिपि कहा जाता है। इस लिपि से ही à¤à¤¾à¤°à¤¤ की अनà¥à¤¯ à¤à¤¾à¤·à¤¾à¤“ठकी लिपियां बनी। यह लिपि वैदिक काल से गà¥à¤ªà¥à¤¤ काल तक उतà¥à¤¤à¤° पशà¥à¤šà¤¿à¤®à¥€ à¤à¤¾à¤°à¤¤ में उपयोग की जाती थी। संसà¥à¤•ृत, पाली, पà¥à¤°à¤¾à¤•ृत के अनेक गà¥à¤°à¤¨à¥à¤¥ बà¥à¤°à¤¾à¤¹à¥à¤®à¥€ लिपि में पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ होते है।
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समà¥à¤°à¤¾à¤Ÿ अशोक ने अपने धमà¥à¤® का पà¥à¤°à¤šà¤¾à¤° पà¥à¤°à¤¸à¤¾à¤° करने के लिठबà¥à¤°à¤¾à¤¹à¥à¤®à¥€ लिपि को अपनाया। समà¥à¤°à¤¾à¤Ÿ अशोक के सà¥à¤¤à¤®à¥à¤ और शिलालेख बà¥à¤°à¤¾à¤¹à¥à¤®à¥€ लिपि में संसà¥à¤•ृत आदि à¤à¤¾à¤·à¤¾à¤“ं में लिखे गठऔर à¤à¤¾à¤°à¤¤ में लगाये गà¤à¥¤
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सिनà¥à¤§à¥ घाटी की लिपि और बà¥à¤°à¤¾à¤¹à¥à¤®à¥€ लिपि में अनेक आशà¥à¤šà¤°à¥à¤¯à¤œà¤¨à¤• समानताà¤à¤‚ है। साथ ही बà¥à¤°à¤¾à¤¹à¥à¤®à¥€ और तमिल लिपि का à¤à¥€ पारसà¥à¤ªà¤°à¤¿à¤• समà¥à¤¬à¤¨à¥à¤§ है। इस आधार पर सिनà¥à¤§à¥ घाटी की लिपि को पढने का सारà¥à¤¥à¤• पà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤¸ सà¥à¤à¤¾à¤· काक और इरावाथम महादेवन ने किया।
सà¥à¤à¤¾à¤· काक ने तो बहà¥à¤¤ शोध पतà¥à¤° तैयार किया à¤à¤µà¤® सिंधॠघाटी की लिपि को लगà¤à¤— हल कर लिया था, परंतॠपà¥à¤°à¤•ाशित करने के à¤à¤• दिन पहले रहसà¥à¤¯à¤®à¤¯ मृतà¥à¤¯à¥ हो गई। ये à¤à¥€ शासà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ जी वाली कहानी थी।Â
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सिनà¥à¤§à¥ घाटी की लिपि के लगà¤à¤— 400 अकà¥à¤·à¤° के बारे में यह माना जाता है, कि इनमे कà¥à¤› वरà¥à¤£à¤®à¤¾à¤²à¤¾ (सà¥à¤µà¤° वà¥à¤¯à¤‚जन मातà¥à¤°à¤¾ संखà¥à¤¯à¤¾), कà¥à¤› यौगिक अकà¥à¤·à¤° और शेष चितà¥à¤°à¤²à¤¿à¤ªà¤¿ हैं। अरà¥à¤¥à¤¾à¤¤ यह à¤à¤¾à¤·à¤¾ अकà¥à¤·à¤° और चितà¥à¤°à¤²à¤¿à¤ªà¤¿ का संकलन समूह है। विशà¥à¤µ में कोई à¤à¥€ à¤à¤¾à¤·à¤¾ इतनी सशकà¥à¤¤ और समृदà¥à¤§ नहीं जितनी सिनà¥à¤§à¥ घाटी की à¤à¤¾à¤·à¤¾à¥¤
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बाà¤à¤‚ लिखी जाती है, उसी पà¥à¤°à¤•ार बà¥à¤°à¤¾à¤¹à¥à¤®à¥€ लिपि à¤à¥€ दाà¤à¤‚ से बाà¤à¤‚ लिखी जाती है। सिनà¥à¤§à¥ घाटी की लिपि के लगà¤à¤— 3000 टेकà¥à¤¸à¥à¤Ÿ पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ हैं।
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इनमे वैसे तो 400 अकà¥à¤·à¤° चिनà¥à¤¹ हैं, लेकिन 39 अकà¥à¤·à¤°à¥‹à¤‚ का पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤— 80 पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤¶à¤¤ बार हà¥à¤† है। और बà¥à¤°à¤¾à¤¹à¥à¤®à¥€ लिपि में 45 अकà¥à¤·à¤° है। अब हम इन 39 अकà¥à¤·à¤°à¥‹à¤‚ को बà¥à¤°à¤¾à¤¹à¥à¤®à¥€ लिपि के 45 अकà¥à¤·à¤°à¥‹à¤‚ के साथ समानता के आधार पर मैपिंग कर सकते हैं और उनकी धà¥à¤µà¤¨à¤¿ पता लगा सकते हैं।
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बà¥à¤°à¤¾à¤¹à¥à¤®à¥€ लिपि के आधार पर सिनà¥à¤§à¥ घाटी की लिपि पढने पर सà¤à¥€ संसà¥à¤•ृत के शबà¥à¤¦ आते है जैसे; शà¥à¤°à¥€, अगसà¥à¤¤à¥à¤¯, मृग, हसà¥à¤¤à¥€, वरà¥à¤£, कà¥à¤·à¤®à¤¾, कामदेव, महादेव, कामधेनà¥, मूषिका, पग, पंच मशक, पितृ, अगà¥à¤¨à¤¿, सिनà¥à¤§à¥, पà¥à¤°à¤®, गृह, यजà¥à¤ž, इंदà¥à¤°, मितà¥à¤° आदि।
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निषà¥à¤•रà¥à¤· यह है कि...
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1. सिनà¥à¤§à¥ घाटी की लिपि बà¥à¤°à¤¾à¤¹à¥à¤®à¥€ लिपि की पूरà¥à¤µà¤œ लिपि है।
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2. सिनà¥à¤§à¥ घाटी की लिपि को बà¥à¤°à¤¾à¤¹à¥à¤®à¥€ के आधार पर पढ़ा जा सकता है।
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3. उस काल में संसà¥à¤•ृत à¤à¤¾à¤·à¤¾ थी जिसे सिनà¥à¤§à¥ घाटी की लिपि में लिखा गया था।
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4. सिनà¥à¤§à¥ घाटी के लोग वैदिक धरà¥à¤® और संसà¥à¤•ृति मानते थे।
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5. वैदिक धरà¥à¤® अतà¥à¤¯à¤‚त पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨ है।
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वैदिक सà¤à¥à¤¯à¤¤à¤¾ विशà¥à¤µ की सबसे पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨ व मूल सà¤à¥à¤¯à¤¤à¤¾ है, यहां के लोगों का मूल निवास सपà¥à¤¤ सैनà¥à¤§à¤µ पà¥à¤°à¤¦à¥‡à¤¶ (सिनà¥à¤§à¥ सरसà¥à¤µà¤¤à¥€ कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤°) था जिसका विसà¥à¤¤à¤¾à¤° ईरान से समà¥à¤ªà¥‚रà¥à¤£ à¤à¤¾à¤°à¤¤ देश था।वैदिक धरà¥à¤® को मानने वाले कहीं बाहर से नहीं आये थे और न ही वे आकà¥à¤°à¤®à¤£à¤•ारी थे। आरà¥à¤¯ दà¥à¤°à¤µà¤¿à¤¡à¤¼ जैसी कोई à¤à¥€ दो पृथक जातियाठनहीं थीं जिनमे परसà¥à¤ªà¤° यà¥à¤¦à¥à¤§ हà¥à¤† हो।
#Tarkeshwar singh
