नदी से - पानी नहीं , रेत चाहिà¤
पहाड़ से- औषधि नहीं , पतà¥à¤¥à¤° चाहिà¤
पेड़ से - छाया नहीं , लकड़ी चाहिà¤à¤˜
खेत से - अनà¥à¤¨ नहीं , नकद फसल चाहिà¤
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उलीच ली रेत, खोद लिठपतà¥à¤¥à¤°,
काट लिठपेड़, तोड़ दी मेड़
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रेत से पकà¥à¤•ी सड़क , पतà¥à¤¥à¤° से मकान बनाकर लकड़ी के नकà¥à¤•ाशीदार दरवाजे सजाकर,
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अब à¤à¤Ÿà¤• रहे हैं.....!!
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सूखे कà¥à¤“ं में à¤à¤¾à¤à¤•ते,
रीती नदियाठताकते,
à¤à¤¾à¤¡à¤¼à¤¿à¤¯à¤¾à¤‚ खोजते लू के थपेड़ों में,
बिना छाया के ही हो जाती सà¥à¤¬à¤¹ से शाम....!
और गली-गली ढूंढ़ रहे हैं आकà¥à¤¸à¥€à¤œà¤¨
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फिर à¤à¥€ सब बरà¥à¤¤à¤¨ खाली l                             Â
सोने के अंडे के लालच में ,Â
मानव ने मà¥à¤°à¥à¤—ी मार डाली !
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पà¥à¤°à¤•ृति का दोहन मत कीजिà¤, पà¥à¤°à¥‡à¤® कीजिठतो ही हम सब उसका संरकà¥à¤·à¤£ कर सकते हैं, और यही वकà¥à¤¤ की माà¤à¤— है।
